हवा सब कुछ छू लेती है; सब कुछ उड़नखटोला; कितनी देर बैठे रहते थे हम हवा की हरी , गुलाबी टहनियों पर.पतंगे जानती थी कि मैं तुम्हारे आँगन में उगे तोतले हाथों से तीख़ी डोर जैसे निकलता हूँ ; और तुम्हारे घर में गुड़गुड़ , बुड़बुड़ करते हुक्कों के धुएं से एक इंच भी रंग फेड नहीं हुआ था हवा का. बगीचे के सबसे संगीन पक्षी के पर मेरी डायरी में उड़ते रहते. परवाह किसको थी, तुम सीढ़ियां उतरती और धरती २-३ हाथ और ऊपर उठ जाती; मुझे लगता था कि जब कोई धरती के निचले बैल को प्यार करने उतरेगा , ऐसे ही उतरेगा.

ये उन दिनों की बात है जब मैं तेरी साँसों में ऊपर नीचे होता पार हो जाता था ; आर रह जाता. तुम्हारा अंतिम प्रेमी जो अब तुम्हारा पति है, जब तुमसे प्यार के बारे में बात करता, तो तुम उसे झुके हुए देवदार दिखाती. हँसती; मुझे आज भी याद हैं तुम्हारी हँसी का टेक्सचर; चुप हो जाता हूँ यह सोचकर कि मैंने दुनिया की सबसे खूबसूरत आवाज को हाथ लगाकर देखा है.

फिर इस पतंग कथा में हर एक तारे ने दम तोडा तारे ने दिया नए तारों को जन्म; मरने के लिए , टूटने के लिए गुड़गुड़ , बुड़बुड़ ने गला घोंट मार दिया एक पक्षी का गीतमैंने तुम्हारे हाथ में रौशनी की हर उस परत को टूटते देखा, जिसमे तुम्हारे गांव के छोटे संगतरी मंदिर की सैंकड़ो दुआएं बंधी थी. और हाँ, पता नहीं क्यों और कहाँ चला गया था इस मंदिर की बग़ल में बैठता वो उदास जादूगर जो घंटों प्यार के किस्से अपने थैले से निकालता था; हवा में घोल देता था किस्से – कहानियाँ. बिना कलम के लिखता था वो तितलियाँ, कबूतर, रंग बिरंगे रुमाल; उसकी जादुई उँगलियों का गीत अब भी पड़ा है मेरे भीतर किसी कोने में. मैंने तुम्हे कभी बताया नहीं कि वो जादूगर एक प्रेमी भी था. उन रूमालों में बोया था अपनी प्रेमिका का नाम; उसने मुझे दिखाया था कैसे रंग बदलते हैं प्रेम में धागे. जब लोग उसके प्रेम को सिर्फ हाथ की सफाई समझ कर हँसते थे तो मुझे बुरा लगता था. उसके रंग, चीज़े, कबूतर, सोटी, उसका जादू, उसके हाथ; सब कुछ उसके शब्द थे.

क्या उस जादूगर ने भी जाने से पहले सारे शब्द मिटा दिए होंगे?

आज कितनी देर बाद हवा मिट रही है. अब तो देवदारों की गर्दन भी ऊँची हो गयी होगी; क्या उनसे लटककर पतंगें अब जान देने की आदि हो चुकी हैं? ये सोच कर उदास रहता हूँ कि अब कौन बैठता होगा जादूगर की जगह पर और उसके सामने भी; क्या उसके रुमाल पर लिखा उसकी प्रेमिका का नाम निकल गया है ? क्या वो भी धीरे धीरे गायब हो रहा होगा इस धरती से.अब तो मेरी डायरी से भी उड़ गया है सबसे संगीन पक्षी हरी गुलाबी कहाँ; मैं अपनी सूखी टहनी से झड़ता हुआ इतिहास रह गया हूँएक दिन ख़ुद को भूल जाऊंगा ख़ुद से अपना पता पूँछूगा, और आगे निकल जाऊंगापर क्या तुम्हें याद है,कि कभी तुम्हारे गाँव की पतंगें भी मुझे जानती थी…

शिवदीप #ਹੈਰਤ6th

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