तंग बाज़ार में किताबों की एक छोटी सी दुकान;
पसीने, इत्र और दूधिया सेक से भरी हुई

तुम्हारी परछाई के पास पड़ी थी मेरी परछाई ; मेरे भीतर प्रशन , तुम्हारे पास उत्तर; और सामने एक किताब, दोनों की नजर थी जिसपर. मेरी हँसी ने चूमा तुम्हारी मुस्कराहट को. मेरे स्पर्श के साथ बहुत कुछ और भी ले गयी थी किताब, जो लंबे समय तक तुम्हारे पास रही. एक शांत चमत्कार. 

“कबीरा खड़ा बाज़ार में”

फिर किताब के साथ, कभी मैं, कभी तुम और कभी कभी हम, भीड़ में सुनसान चलते; धीरे-धीरे तुम्हारी किताबें , मेरी किताबें , हमारी बनकर एक जगह जमा होने लगी. हम किताबों में उतरते , कविताओं में गोते लगाते. देर तक बैठते तुम्हारे घर कि पीछे वाले मैदान में; फूलों , रंगो और महक की छाया में. वहीं तुम्हारे साथ में मैंने जाना कि महक और कविता दोनों को छू कर देखा जा सकता है ; जाना कि तितलियाँ , तितलियाँ नहीं बल्कि उड़ते हुए फूल हैं तुम्हारी और मेरी छाया को सीने में संभाले.     

बहुत देर तक मेरी सिगरेट की बू उलझी रही है तुम्हारी कमीज़ के सबसे महीन धागे में. मगर मैं नहीं जानता था कि हम पतझड़ के इंतज़ार में बसंत गुज़ार रहे हैं. पता नहीं क्या हुआ कि एकदम से किताब में जो सबसे नाज़ुक चीज़ थी, टूट गई.

मैं लंबे समय तक किताबों / कविताओं में तुम्हे ढूंढ़ता रहा हूँ. लोग फिर से भीड़ लगने लगे. किसी को नहीं पता होगा कि यह सोचना कितना भयंकर है कि मकान और घर के बीच जितने भी पेड़ हैं, सभी के कागज़ बन जाएँ. न जाने ऐसा क्या लिखना था मुझे.

मेरे नाखुनो ने भी पढ़ी हैं किताबें; और लिखा है दीवारों पर

स्टडी में बिख़री हर किताब जानती है मेरे हाथों का कांपना
और तुम्हारी डोर-बेल्ल के पास पड़ा है मेरे पैरों का बेचैन इतिहास-

क्या तुम्हें याद है,
सिर्फ तुम्हारी परछाई के पास पड़ी थी मेरी परछाई ;
और बाज़ार, बाज़ार नहीं रहा था.

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