काला मेंढक

अकथित धीरे धीरे
बदल जाता किसी तेज़ धातु में
कुआँ खोदता

‘अभी देर नहीं हुई’ या ‘आप समय रहते आ गए’
यह महज फिल्मी डॉयलाग हैं
देर तो पलक झपकते ही हो जाती है

आदमी सारी उम्र
इस रहस्मयी कुएं को सीने पर लिए घूमता है
जिसमें और लम्बा, और गहरा हो रहा है अँधेरा
मिलने के लिए
नियत की जगहों के नीचे
लाल-पीले कच्चे-पक्के धागों से बंधा रहता है पानी

कभी कभी इस अगाध कुएं से आवाज आती है
एक-आध कविता भी
प्रेमिकाएं भी
चुप भी
एक पीपल का पेड़ और उसकी लंबी जटाएं-
उन पर उल्टा चलता है काल

दिखाई देते हैं लम्बे दाँतों वाले कल्पित जानवर, परछाईयाँ
जिनका प्रचंड कोलाहल
पाग़ल हो जाने की हद्द तक मेरा पीछा करता है

मैं एकदम सर झटक कर, निस्तब्ध इस कुएं में झांकता हूँ-
देखता हूँ कि साँप से बचने की कोशिश में
एक मेंढक इधर- उधर कूद रहा है,
वो कभी चुप पर कूदता है, कभी प्रेम पर
कभी मेरी दी आवाज़ों की सूखी पृष्ठभूमि पर

मैं कुएं में उतरता हूँ, निहत्था
ये जानते हुए भी
कि इस पाग़ल मेंढक को बचाने के चक्कर में
मैं साँप से डसा जाऊँगा
.
शिवदीप

#ਹੈਰਤ6th

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