मैं चाय के
एक मैले गिलास किनारे बैठा हूँ
जिसमें से शराब की हमक आ रही है
सामने नदी दौड़ रही है
दूसरी ओर खड़े पहाड़ का भारा प्रतिबिम्ब लहराते हुए

गीले सूखें, डूबे-तैरते पत्थरों से छिलकर
पानी की त्रिकोणी आवाज़ मुझे भेदती हुई गुज़र रही है

मैं तुम्हारे बारे में सोच रहा हूँ

सोचता हूँ कि जिस कविता में तुम अब प्रतिबिम्बित हो
रहते होंगे और लोग भी पास तुम्हारे
एक तीख़ा मोड़ आता होगा किसी पंक्ति के मध्य में, जहां पर रुक के
अब भी तुम्हें देखता होगा तुम्हारा एकतरफ़ा प्रेमी
या शायद उसकी जगह किसी और ने ले ली होगी

क्या अब भी तुम्हारी प्रतीक्षा करता होगा लंगड़ा दर्जी,
हाथ में कैंची लिए ,
गले में डालकर इंचीटेप, मन में साँप
अपनी आत्मा की हड्डी तोड़ता
तुम्हारे जिस्म को इंच इंच काटने के लिए

कितनी चीज़े, देह-अदेह , दृश्य -अदृश्य
बू , पशु-पक्षी, मनुष्य, मनुष्यता
तुम्हारे साथ चला गया है

जा रहा है अब प्रेम भी मेरी देह को छोड़ कर
जैसे एक तेज़ जापानी चाक़ू
ठंडी चमड़ी से सीधी लकीर बनाता निकल जाता है

सामने फुदक रही चिड़िया को
किसी विलुप्त हो रही प्रजाति की तरह
अपने कैमरे में बंद करने की कोशिश कर रहा हूँ
ठीक ऐसे ही तुम्हारा बहुत कुछ संभालता रहता हूँ
टिकाता हूँ, अपने भीतर उभड़ी चद्दानों पर
किसी जल्द गिर जाने वाली ईमारत के अंदर

आसपास घूम रहे यात्रियों को देखता हूँ
न जाने क्या ढूंढ़ने आते हैं मेरी तरह इस एकांत में

क्या इनको भी उसी तीख़े चाकू ने चूमा है ?

मैं अपने किनारे पर बैठा हूँ
अपने हिस्से का लोहा अपनी देह से गांठ कर

पहाड़ का प्रतिबिम्ब हटाकर
पानी ले कर जा रहा अपने साथ एक कविता
जो मुझसे लिखी नहीं गई
तुम भी इस कविता में गीले हो जाने से बचे रहना –

पर तुम्हे कभी मौका मिले तो यह जरूर लिखना
कि जिस प्रेम में हम एक बार भीगे थे
उसमे नदी कितनी और पानी कितना था
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